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Tuesday, 28 April 2009

सुनसान हुआ अप्रैल का शुक्रवार


वर्ष २००९ के पहले 6 महीने के अप्रैल का एक महीना ऐसा भी जब एक भी फिल्म शुक्रवार को परदे पर नजर नहीं आ रही हैं। आखिर कहें तो सुनसान हो गया शुक्रवार। फिल्मी दीवानों को हर शुक्रवार का इंतजार रहता है लेकिन इस बार शुक्रवार को लग गई शनि की नजर और उस पर आई मंगल की छाया। असल में अप्र्रैल २००९ फिल्मी कारोबार से बिल्कुल ठंडा है इसके पीछे बहुत से तो नहीं बल्कि कुछ कारण जरूर है। एक तो फिल्म निर्माताओं और मल्टीप्लैक्स मालिकों के बीच का भयंकर विवाद। आप सोचते होंगे आखिर यह विवाद है क्या बला। फिल्म निर्माता और मल्टीप्लैक्स मालिकों के बीच फिल्म के शेयर को लेकर आए दिन झगड़ा होता रहता है। फिल्म निर्माता और वितरक ज्यादा मुनाफा चाहते हैं और मल्टीप्लैक्स वाले देना नहीं चाहते। इसको लेकर कई बार खींचतान हुई है और बात जब ज्यादा बढऩे लगी तो निर्माता और वितरक एक होकर मल्टीप्लैक्स वालों का मुकाबला करना चाहते हैं। बात सिर्फ शेयर की नहीं है और भी कई शिकायतें निर्माताओं को हैं। जैसे मल्टीप्लैक्स वाले ही इस बात का फैसला करते हैं कि कौन-सी फिल्म कितना चलेगी। वे कभी भी फिल्म को उतार देते हैं। शो और उसके समय का फैसला भी ज्यादातर वे ही लेते हैं। उनके इस कदम से हर फिल्म के प्रदर्शन के पहले निर्माता और उनके बीच माथापच्ची होती है। फिल्म निर्माता चाहते हैं कि इन सारे मामलों पर सहमति बन जाए, तभी वे फिल्म प्रदर्शित करेंगे। इसी विवाद को लेकर बॉलीवुड के दो बड़े महारथी अपने गिले-शिकवे भूलाकर आमिर खान औैर शाहरूख खान भी सामने आये। दोनों फिल्म निर्माता भी हैं और बॉलीवुड के अन्य निर्माताओं के दर्द से अच्छी तरह परिचित हैं। आमिर ने स्पष्ट रूप से कहा कि निर्माताओं को शेयर में 50 प्रतिशत हिस्सा चाहिए और वे झुकने वाले नहीं हैं। यदि मल्टीप्लैक्स निर्माता बात नहीं मानते हैं तो वे सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में फिल्में प्रदर्शित करेंगे क्योंकि कुछ वर्ष पहले फिल्में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में लगती थी और सुपरहिट भी होती थीं। आमिर के विपरीत शाहरुख ने मजाकिया लहजे में बात की। उन्होंने कहा कि पूरा बॉलीवुड एक परिवार की तरह है और उनके बीच झगड़ा होना आम बात है। वे यहाँ पर मल्टीप्लैक्स वालों को धमकाने के लिए नहीं आए हैं। उनका मानना है कि यह विवाद बहुत जल्दी सुलझा लिया जाएगा। इसी बीच निर्माता भी अपनी चालाकी करने से बाज नहीं आये क्योंकि उनको पता है कि अप्रैैल के महीने में चुनावी गरमी का मौसम हैऔर साथ ही आईपीएल की बारिश भी हो रही है जिसके चलते थियेटर में फिल्मों को उतारना खतरे की घंंटी बजाने के बराबर सी लगती है। इसीलिये वो भी आजकल रोड शोज करके चुनाव का मजा ले रहे है रात को ठंडी हवा में क्रिकेट का। वाह जनाब! तो इसीलिये इस महीने इस विवाद पर जितनी मिर्ची लगानी है क्यों ना लगा ली जाये। जिससे एक-दूसरे को सबक सिखाने का अवसर भी सफल हो जायेगा। फिल्म निर्माता और मल्टीप्लैक्स मालिक कितना भी लड़-झगड़ लें, वे इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। मल्टीप्लैक्स के आने से फिल्म व्यवसाय में इजाफा हुआ है। छोटे निर्माता और कला फिल्म बनाने वालों को भी अब अपनी फिल्म प्रदर्शित करने का अवसर मिलने लगा है। सुपरहिट फिल्मों का व्यवसाय जहाँ करोड़ों में पहुँच गया है तो उसमें मल्टीप्लैक्स के योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता। उधर मल्टीप्लैक्स वाले सिनेमा निर्माताओं पर पूरी तरह निर्भर हैं। आने वाले 6 महीने में 45 से भी ज्यादा बड़े बजट की फिल्में आने वाली है जिसका फायदा तो सभी उठाना चाहेंगे। इसीलिये सोच-विचार कर इस विवाद को खत्म करने का प्रयास करें।

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