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Friday, 1 May 2009

मैं साहित्यकार को तीसरी आंख मानता हूं: विष्णु प्रभाकर

राष्ट्र उनकी और दिशा निर्देश हेतु देख रहा है, लेकिन साहित्यकार असफल हो रहा हैं। मैं साहित्यकार को तीसरी आंख मानता हूं। व्यवस्था को ठीक ढंग से चलने को बाध्य करने का दायित्व साहित्यकार पर है। उसे इस बहुत बड़े दायित्व का भार वहन करना चाहिए। वह यह काम सीधे आक्रमण करके नहीं करता बल्कि अपने पाठकों को सही स्थिति से परिचित कराता है। ऐसे कराता है कि उसकी संवेदना जाग उठती है। स्पष्टï विचारों को रखने वाले गांधी टोपी, कपड़े का झोला लिये युवाओं में नयो जोश भरने वाले और गांधी से प्रभावित व स्वंतत्रता सेनानी रहे विष्णु प्रभाकर, जिन्होंने कहा जीने के लिये तो सौ की उम्र भी काफी छोटी है। जिनके जाने के बाद साहित्य जगत बिल्कुल पंखहीन हो गया है। पिछले ५० वर्षो से चालीस से भी ज्यादा पुस्तके लिख चुके है जिसमें नाटक, एकांकी, उपन्यास, जीवनी आदि। प्रभाकर को पद्मभूषण दिया गया, लेकिन सरकार द्वारा किसी साहित्यकार की देर से सुध लेने का आरोप लगाते हुए उन्होंने सम्मान वापस कर दिया। उनके बारे में नया ज्ञानोदय में प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखा था-विष्णुजी साहित्य और पाठकों के बीच स्लिप डिस्क के सही हकीम हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य पुरस्कारों के कारण नहीं पाठकों के कारण चर्चित हुआ। प्रभाकर का जन्म 1912 को उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गाँव में हुआ था। कम आयु में ही वे पश्चिम उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर से तत्कालीन पंजाब के हिसार चले गए। प्रभाकर पर महात्मा गाँधी के दर्शन और सिद्धांतों का गहरा असर पड़ा। इसके चलते ही उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के महासमर में उन्होंने अपनी लेखनी का भी एक उद्देश्य बना लिया, जो आजादी के लिए सतत संघर्षरत रही। अपने दौर के लेखकों में वे प्रेमचंद, यशपाल जैनेंद्र और अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, लेकिन रचना के क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान रही। हिन्दी मिलाप में 1931 में पहली कहानी दीवाली छपने के साथ उनके लेखन को एक नया उत्साह मिला और उनकी कलम से साहित्य को समृद्ध करने वाली रचनाएँ निकलने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह करीब आठ दशकों तक सक्रिय रहा। आजादी के बाद उन्हें दिल्ली आकाशवाणी में नाट्य निर्देशक बनाया गया। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने पर वे शरतचंद्र की जीवनी पर आधारित उपन्यास आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए। इस उपन्यास के लिए उन्होंने शरत बाबू से जुड़े स्रोत जुटाए, कई स्थानों का दौरा किया और बांग्ला भाषा सीखी। यह जीवनी छपकर जब बाजार में आई तो साहित्य जगत में विष्णु प्रभाकर के नाम की धूम मच गई। प्रचूर साहित्य सृजन के बावजूद और अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी सम्मान मिलने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गया और इसने साहित्य में उनका अलग मुकाम बनाए रखा। प्रभाकर के लिखे उपन्यासों में ढलती रात, आवारा मसीहा, अर्धनारीश्वर, धरती अब भी घूम रही है, क्षमादान, दो मित्र प्रमुख हैं। उन्होंने तीन भागों में अपनी आत्मकथा पंखहीन भी लिखी। विष्णु प्रभाकर को साहित्य सेवा के लिए पद्मभूषण, अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी सम्मान और मूर्तिदेवी सम्मान सहित देश-विदेश के अनेक सम्मानों से नवाजा ।

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